• Saturday, 11 May 2019

    विक्रमादित्य मंदिर









     विक्रमादित्य, संस्कृत और भारत के क्षेत्रीय भाषाओं, दोनों में एक लोकप्रिय व्यक्तित्व है। उनका नाम बड़ी आसानी से ऐसी किसी घटना या स्मारक के साथ जोड़ दिया जाता है,अपनी बुद्धि, अपने पराक्रम, अपने जूनून से इन्होने आर्यावर्त के इतिहास में अपना नाम अमर किया है जिनके ऐतिहासिक विवरण अज्ञात हों  500 साल पुराने इस मंदिर से अनेक कथाएं जुड़ी हैं। दूरदराज से भक्त राजा विक्रमादित्य के दर्शन के लिए आते हैं। परन्तु इन कहानियों का मूल उद्देश्य है जीवन में सफलता और सच्चाई का मार्ग ढूंढना. ये एक ऐसे राजा हुए, जिन्होंने अपने समय को अपने नाम से परिभाषित किया और आज भी इनके नाम से विक्रमी संवत मनाया जाता है. ये एक न्यायप्रिय शासक थे.चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा गुड़ी पड़वा पर मंदिर में राजा को छप्पन पकवानों का भोग लगाया जाता है








    इंदौर रोड पर त्रिवेणी संगम पर राजा विक्रमादित्य के समय से बना 2074 साल से अधिक पुराना देश का पहला नवग्रह शनि मंदिर जहाँ आज शनि अमावस्या पर्व पर देशभर के श्रद्धालु शिव रूप में शनिदेव को तेल चढ़ाकर प्रसन्न करेंगे








    मध्यप्रदेश में स्थित उज्जैन-महानगर के महाकाल मन्दिर के पास विक्रमादित्य टिला है। वहाँ विक्रमादित्य के संग्रहालय में नवरत्नों की मूर्तियाँ स्थापित की गई हैं। ये दसवीं से बारहवीं सदी के बीच रचित ग्रन्थ है. इसमें प्रथम महान गाथा विक्रमादित्य और परिष्ठाना के राजा के बीच की दुश्मनी की है. इसमें राजा विक्रमादित्य की राजधानी उज्जैन की जगह पाटलिपुत्र दी गयी है. एक कथा के अनुसार राजा विक्रमादित्य बहुत ही न्यायप्रिय राजा थे.  राजा विक्रमादित्य की गाथाएं संस्कृत के साथ कई अन्य भाषाओँ की कहानियों में भी देखने मिलते हैं. उनके नाम कई महागाथाओं और कई ऐतिहासिक मीनारों में देखने मिलते हैं, जिनका ऐतिहासिक विवरण तक नहीं मिल पाता है. इन कहानियों मे विक्रम बैताल और सिहासन बत्तीसी की कहानियाँ अति रोचक महत्वपूर्ण और ज्ञानवर्धक है. 

     

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