• Saturday, 24 November 2018

    जयपुर का इतिहास

                            जयपुर का इतिहास 









     जिसे गुलाबी नगर के नाम से भी जाना जाता हैभारत में राजस्थान राज्य की राजधानी है। यह जयपुर नाम से प्रसिद्ध है  इस शहर की स्थापना   आमेर के महाराजा जयसिंह द्वितीय ने  सन १७२८ में की थी यह शहर तीन ओर से अरावली पर्वतमाला से घिरा हुआ है। अपनी सुंदरता से पूरे विश्व में प्रसिद्ध है  इस शहर की पहचान यहाँ के महलों और पुराने घरों में लगे गुलाबी धौलपुरी पत्थरों से होती है  जिन गांवों को मिलाकर जयपुर को बसाया गया था उनका पुराना नाम वर्तमान के नामों से अलग थे। नाहरगढ़, तालकटोरा, संतोषसागर, आज का मोती कटला, गलताजी और आज के किशनपोल को मिलाकर जयपुर को बनाया गया था।









     जयपुर को बहुत ही सुनियोजित तरीके से बसाया गया है। इसमें महाराजा के महल ,औहदेदारों के हवेली और बाग़ बगीचे ही नही बनाये गए बल्कि आम नागरिको के लिए आवास और राजमार्ग भी बनाये। गलियो का और सड़को का निर्माण वास्तु के अनुसार और ज्यामितीय तरीके से किया गया है।

    जयपुर के इतिहास के बारे में जानकारी

     जयपुर इतिहास वास्तव में मनोरम है। जयपुर, भारत का गुलाबी गौरव, 1728  में एक शहर के रूप में स्थापित किया गया था। इससे पहले बहुत पहले, 12 वीं शताब्दी में, राजपूतों का कांचवाड़ा परिवार आवरली घाटी के पुराने किले महल में पहुंचे, अंबर किले कांचवाड़ा कुश के उत्तराधिकारी के रूप में अपने जन्म का दावा करते थे, जो भगवान राम के पुत्र थे। अब यह कहानी का एक विवादास्पद हिस्सा है, लेकिन इन कंचवाओं ने जो कुछ किया था, उनकी सदाबहार तलवारें की मदद से बहुत सारी शक्तियां एकत्रित की गईं। वे प्रख्यात महत्वाकांक्षी, काल्पनिक, और आक्रामक थे और उन्होंने अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए कुछ भी नहीं किया। इस प्रकार जयपुर का गौरवशाली इतिहास अपने प्रवास शुरू कर दिया।अंबर किले अभी भी वहां है, अपने सभी गौरव और महिमा के साथ सीधे खड़े हैं यह रंगों में स्वर्ण है और एक क्रैबी पहाड़ी पर स्थित है। मैटा झील जो कई लड़ाइयों के एक दर्शक है, आप पर घूरेंगे जैसे कि वह आपको कुछ बताना चाहता है। किला जयपुर के इतिहास के किसी भी उत्साही के लिए देखना चाहिए। किले पहाड़ियों से परिचित हैं। घाटी पर, जयगढ़ किला है जो इसे पूरी तरह रक्षात्मक बनाता है। असली जादू एम्बर किले के अंदर है जहां आप पूल, कैसकेड और आर्टिफैक्ट पाएंगे जो आपको सुनिश्चित करने के लिए सम्मिलित करेंगे

    हवा महल का  इतिहास

    महल में एक और आकर्षित करने वाली बात दीवार के मुड़े हुए किनारे है। जयपुर में बने दूसरे स्मारकों की तरह ही यह महल भी लाल और गुलाबी रंग के पत्थरो से बना हुआ है इसका निर्माण 1799 में महाराजा सवाई प्रताप सिंह ने करवाया था। इस पाँच मंजिला ईमारत के बाहर समान आकर के शहद के छत्ते भी लगे हुए है और महल में 953 छोटी खिड़कियां भी है जिन्हें झरोखा कहा जाता है और इन झरोखो को बारीक़ कलाकृतियों से सजाया भी गया है पुरे 50 साल बाद 2006 में महल की मरम्मत की गयी, इस समय इस स्मारक का मूल्य तक़रीबन 4568 मिलियन रुपये बताया गया था। वहाँ के कॉर्पोरेट सेक्टर ने इस स्मारक की सुरक्षा का जिम्मा उठाया लेकिन बाद में भारत के यूनिट ट्रस्ट ने यह जिम्मा उठाया। हवा महल के प्रसिद्ध होने के बाद इसके कॉम्पलेक्स को भी विकसित किया गया था। पर्यटको को बहोत सी इतिहासिक चीजे हवा महल में देखने मिलती है।

    हवा महल की रोचक बाते










    1. यह महल बहोत से भारतीयो और अंतर्राष्ट्रीय फिल्मो का पसंदीदा शूटिंग स्पॉट बना हुआ है।
    2. हवा महाल में ऊपरी मंजिल में जाने के लिए केवल ढालू रास्ता है, वहाँ ऊपर जाने के लिये कोई सीढ़ी नही बनी है।
    3. महाराजा सवाई प्रताप सिंह ने 1799 में हवा महल को बनवाया था।
    4. इसकी पाँच मंजिले पिरामिड के आकार में बनी हुई है जो उसकी ऊँचे आधार से 50 फ़ीट बड़ी है।
    5. हवा महल की भगवान श्री कृष्ण के राजमुकुट के आकार का बनाया गया है।
    6. हवा महल के खिड़कियों की जाली चेहरे पर लगे परदे का काम करती थी।
    7. हवा महल गुलाबी और लाल रंग के पत्थरो से बनाया गया 
    8. जयपुर के सभी शाही लोग ईस महल का उपयोग गर्मियों आश्रयस्थल की तरह करते है।
    9. हवा महल को लाल चंद उस्ताद ने डिज़ाइन किया था।
    10. यह महल विशेषतः जयपुर की शाही महिलाओ के लिये बनवाया गया था।  
      जयपुर का जन्तर मन्तर 

    सवाई जयसिंह द्वारा १७२४ से १७३४ के बीच निर्मित एक खगोलीय वेधशाला है। यह यूनेस्को के 'विश्व धरोहर सूची' में सम्मिलित है। इस वेधशाला में १४ प्रमुख यन्त्र हैं जो समय मापने, ग्रहण की भविष्यवाणी करने, किसी तारे की गति एवं स्थिति जानने, सौर मण्डल के ग्रहों के दिक्पात जानने आदि में सहायक हैं। इन यन्त्रों को देखने से पता चलता है
    कि भारत के लोगों को गणित एवं खगोलिकी के जटिल संकल्पनाओं (कॉंसेप्ट्स) का इतना गहन ज्ञान था कि वे इन संकल्पनाओं को एक 'शैक्षणिक वेधशाला' का रूप दे सकते  है 

    सिटी पैलेस

    सिटी पैलेस का इतिहास शुरू से ही जयपुर शहर और उसके शासको के इतिहास से जुड़ा हुआ है, जिसकी शुरुवात महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय से होती है, जिन्होंने 1699 से 1744 तक शहर पर राज किया था। महल के निर्माण का श्रेय सबसे पहले उन्ही को दिया जाता है, क्योकि उन्होंने ही महल में काफी एकरो तक फैलने वाली दीवार के निर्माण की शुरुवात यहाँ की था शुरू में महाराजा अपने शहर अम्बेर से जयपुर पर शासन करते थे,
    जो जयपुर से 11 किलोमीटर की दुरी पर स्थित है। लेकिन 1727 में अम्बेर में जनसँख्या की समस्या और पानी की कमी होने के कारण उन्होंने जयपुर को अपनी राजधानी बनाया। उन्होंने वास्तुशास्त्र के अनुसार इस शहर को 6 अलग-अलग भागो में बाटने की योजना बना रखी थी।


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